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Jadui Kahani | Hindi Kahaniya गुडिया और राक्षस जादुई कहानी

यहाँ आप पढेंगे Jadui Kahani, New Hindi Kahaniya,बहुत समय पहले की बात है एक बहुत बड़ा सौदागर था समुन्द्र के रास्ते से वह विदेशों में अपना व्यापार करता था सौदागर के एक छोटी लड़की भी थी जिसका नाम प्रीती था वह अपनी बेटी से बहुत प्यार करता था.

प्रीती भी अपने माता पिता को बहुत चाहती थी, एक बार कारोबार के सिलसिले में समुन्द्र की यात्रा पर जा रहा था, जाने से पहले उसने अपनी बेटी प्रीती को अपने पास बुलाया और प्यार से पूंछा बेटी में व्यापार के सिलसिले में विदेश जा रहा हूँ, तुम्हे कुछ मँगवाना हो तो बताओ.

पिता जी जो भी चीज में आपसे कहूँगी वो मुझे लाकर दोगे प्रीती ने मासूमियत से पूंछा” हाँ बेटी जरुर लाऊंगा तुम कहो तो सही तुम्हे क्या चीज चाहिए.

प्रीती ने कहा पिताजी आप मेरे लिए एक ऐसी गुडिया लाना, जो मुझसे बातें करे प्रीती की बात सुनकर सौदागर को हँसी आ गयी प्रीती की यह साधारण सी इच्छा जानकार वह अपने सफर पर निकल पड़ा.

समुद्री सफर इस बार बहुत लम्बा था सौदागर का जहाज दिन-रात अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ता जा रहा था.

Jadui Kahani

कुछ दिनों में मौसम बदलना शुरू हो गया समुद्री तूफ़ान का खतरा मंडराने लगा वह भगवान से प्रार्थना कर रहा था, इस सफर के दौरान कोई अड़चन ना हो तभी जोरों की आंधी चलने लगी आकाश में काली घटायें घिरने लगीं समुद्री लहरों ने उछाल मारना आरम्भ कर दिया अब समुद्री तूफ़ान शुरू हो चुका था.

समुद्र की ऊँची लहरों से जहाज डगमगाने लगा जहाज में सभी लोग घबराने लगे तभी जहाज एक चट्टान से टकरा गया, जैसे ही जहाज चट्टान से टकराया जहाज के टुकड़े बिखर गये.

जहाज में सभी लोग डूबने लगे इत्तेफाक से सौदागर के हाथ में लकड़ी का एक बड़ा सा टुकडा हाथ में आ गया, उसने लकड़ी के टुकड़े को मजबूती से पकड़ लिया.

तूफ़ान अभी कम नहीं हुआ था समुन्द्र में ऊँची लहरें उठ रहीं थीं, सौदागर लकड़ी के टुकड़े के सहारे समुन्द्र में तैरने लगा तैरते-तैरते उसे कई दिन बीत गये थे , अब वह बुरी तरह थक चुका था.

उसके शरीर की शक्ति खत्म होती जा रही थी, जिसकी वजह से वो हिम्मत हार चुका था तभी उसे सामने एक टापू दिखाई दिया, टापू को देखकर उसकी जान में जान आई थोड़ी दूर जाने के बाद वह टापू पर पहुँच गया.

उस टापू पर दूर दूर तक कोई भी नजर नहीं आ रहा था, चारों तरफ मौत का सा सन्नाटा था थोड़ी दूर चलने के बाद उसे एक महल दिखाई दिया वह धीरे-धीरे महल की तरफ बढ़ा, उसके दिल की धड़कन बढती जा रही थी.

सौदागर ने डरते डरते उस महल में क़दम रखा उस महल के अंदर सब सुविधाएँ थीं, उसे बहुत भूख लगी थी इसलिए वो रसोईघर की तरफ बढ़ा तो हैरान रह गया वहां रखी मेज के उपर अनेक प्रकार की स्वादिष्ट भोजन रखे हुए थे, जबकि वहां कोई नहीं था .

भोजन देखकर उसकी भूख और भी बढ़ गयी, सौदागर कई दिन का भूखा था इसलिए खाना देखकर उससे रहा नहीं गया, पहले उसने पेट भर खाना खाया फिर स्वादिष्ट पेय-पधार्थ पिए.

वह कई दिनों तक तैरते-तैरते थक चुका था इसलिए बिस्तर पर लेटते ही सो गया, सुबह जब उसकी आँख खुली तो वह महल की खिड़की के पास जाकर खडा हो गया जब उसने खिड़की से बहार झांक कर देखा तो उसे एक बहुत ही सुन्दर बगीचा दिखाई दिया.

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वह बगीचा बहुत ही विचित्र और सुन्दर था वह काफी देर दर बगीचे को देखता रहा, उसने देखा बगीचे में तरह-तरह के फूलों के पौधे लगे थे.

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पर काफी बड़े-बड़े वृक्ष भी थे बगीचे में घूमते-घूमते उसकी नजर एक कमरे पर जाकर रुक गई कमरे को देखकर उसे आचार्य भी हुआ वह धीमे क़दमों से उस कमरे के अंदर गया कमरा खाली था उसने चारों तरफ नजर घुमाते हुए कमरे को देखा.

वहां अनेक सुन्दर-सुंदर गुडिया रखी थीं कुछ देर तक वह उन गुड़ियों को देखता रहा उन गुड़ियों को देखकर उसे अपनी बेटी की याद आ रही थी, उनमें से एक गुडिया उसने उठा ली और वह कमरे से बाहर आ गया, लेकिन बाहर आते ही वह आश्चर्यचकित रह गया क्यूंकि वह गुडिया एक राक्षश का रूप लेती जा रही थी.

कुछ देर बाद ही उस गुडिया की जगह उसके सामने एक भयंकर राक्षस खड़ा हो गया उस राक्षस की बड़ी आँखें, बड़े सिंग, बड़े दांत देखकर वह सौदागर बहुत घबरा गया उसकी ऑंखें भय से फटी की फटी रह गयीं.

सौदागर ने पूंछा क…. क….. कौन हो तुम

राक्षस ने कहा : में यहाँ का मालिक हूँ, तुझे यहाँ आने की अनुमति किसने दी.

सौदागर ने डरते डरते कहा : में यहाँ भूल से आ गया हूँ, मुझे माफ़ कर दो राक्षस राज…

राक्षस गुर्रा कर बोला : बेवकूफ इंसान यह गुडिया लेकर तूने बहुत बड़ा अपराध किया है..

सौदागर बोला : मुझे माफ़ कर दो मैंने यह गुडिया भूल से उठा ली थी, अब ऐसा नहीं करूंगा…

राक्षस बोला : तुझे इस महल और बगीचे में आने का अधिकार नहीं है में तुझे अब खा जाउंगा.

सौदागर बोला : राक्षस राज मुझे माफ़ कर दो मैंने ये गुडिया अपनी बेटी के लिए चुराई थी.

राक्षस गुर्राते हुए बोला : कौन सी बेटी सौदागर बोला मेरी बेटी प्रीती यदि तू बचना चाहता है तो एक ही उपाय है.

सौदागर बोला : कौन सा उपाय

राक्षस बोला : अगर तू अपनी बेटी को यहाँ रहने के लिए भेज दे तो में तुझे नहीं मारूंगा.

सौदागर बोला : लेकिन मेरी बेटी तुम्हारे पास कैसे रह सकती है वो तो तुम्हे देखकर ही डर जाएगी .

राक्षस बोला : सोचले अगर तू बचना चाहता है तो तुझे अपनी बेटी को मेरे पास भेजना ही होगा .

अब सौदागर के पास राक्षस की बात मानने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था, सौदागर बोला ठीक है राक्षस जी आप मुझे यहाँ से जाने दें में अपनी बेटी को तुम्हारे पास भेज दूंगा.

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सौदागर के ऐसा कहते ही राक्षस खुश हो गया और बोला अब तू बच गया

सौदागर बोला : लेकिन मेरे सामने एक समस्या है

राक्षस बोला : कैसी समस्या

सौदागर बोला : मेरे पास ना तो कोई जहाज है ना कोई नाव है जिससे में अपने घर पहुँच सकूँ.

राक्षस बोला : कोई बात नहीं उसका प्रबंध में कर देता हूँ, मगर तुझे अपना वादा तो याद है ना?

सौदागर : हाँ हाँ बहुत अच्छी तरह याद है

राक्षस ने सौदागर को एक जादुई कुर्सी दी, जिसपर बैठकर वह आसानी से घर पहुँच सकता था, सौदागर उस जादुई कुर्सी पर बैठ गया और जादुई कुर्सी हवा में उडती हुई उसके घर की ओर बढ़ने लगी, कुछ देर में वह अपने घर पहुँच गया.

घर पहुँचने के बाद सौदागर उदास हो गया जबकि उसकी पत्नी और बेटी उसके घर आ जाने से बहुत खुश थे.

वह सोच रहा था की अपने कलेजे के तुकडे को उस राक्षस के पास कैसे भेजे रात को वह लेटा इसी विषय में सोच रहा था पत्नी के पूंछने पर उसने सारी बात उसे बता दी लेकिन इस बात से बेखबर था, की प्रीती ने भी सारी बात सुन ली थीं.

मगर वह नींद का बहाना करके लेटी हुई थी, अपने पिता की जान बचाने के लिए प्रीती ने फैसला किया की वह राक्षस के पास जाएगी ,उसने अपने पिता से कहा” पिताजी आप मेरी चिंता मत कीजिये में उस राक्षस के पास जाउंगी, यह तू क्या कह रही है बेटी.

प्रीती की बात सुनकर सौदागर दुखी हो गया प्रीती ने कहा पिताजी में सच कह रही हूँ इसी में मेरी और आप लोगों की भलाई है.

लेकिन तुझे यह बात कैसे पता चली ?

प्रीती : जब आप रात में मम्मी से ये बात बता रहे थे तभी मैंने भी ये बात सुन ली थी.

सौदागर : लेकिन बेटी में तुझे जानबूझकर उस राक्षस के हवाले कैसे कर दूँ.

प्रीती ने कहा : आप मेरी चिंता मत कीजिये बस आप मुझे वहां जाने की आज्ञा दें.

सौदागर ने प्रीती को वहां जाने की आज्ञा दे दी , इसके अलावा उसके पास कोई चारा भी तो नही था

सौदागर ने प्रीती को जादुई कुर्सी पर बैठा दिया, कुर्सी उड़कर राक्षस के महल में पहुंची प्रीती को देखते ही राक्षस खुश हो गया फिर उसके बाद प्रीती राक्षस के साथ रहने लगी.

कुछ दिनों तक उसे अपने माता-पिता की याद भी आई राक्षस के महल में प्रीती को हर प्रकार की सुविधाएँ थीं प्रीती राक्षस के साथ अच्छा व्यवहार करती थी, इस प्रकार उसने राक्षस का काफी हद तक विश्वाश जीत लिया था.

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प्रीती राक्षस की हर बात का ख्याल रखती थी, राक्षस भी प्रीती के आने से बहुत खुश था हर समय वह प्रीती को अपने सामने रखता और उसका ख्याल भी रखता उसको किसी भी प्रकार का दुःख नहीं होने देता था.

प्रीती को वहां रहते-रहते काफी दिन गुजर चुके थे, अब उसे अपने माता पिता की बहुत याद आ रही थी, उसका दिल चाहता था की वह जाकर किसी तरह अपने माता पिता से मिल आये लेकिन राक्षस से कहने से वो डरती थी, वह जानती थी की राक्षश उसे उसके माँ-पिता के यहाँ जाने की इजाजत नहीं देगा.

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एक दिन उसने मौका पाकर राक्षस से कहा क्या आप मेरी एक बात मान सकते हैं?

राक्षस ने पूंछा : कौनसी बात?

प्रीती ने विनती करते हुए कहा : मुझे अपने माता-पिता की बहुत याद आ रही है, क्या आप मुझे वहाँ जाने की आज्ञा दे सकते हैं.

राक्षस ने कहा” नहीं हम तुम्हें किसी भी कीमत पर तुम्हारे माता पिता के यहाँ नहीं जाने देंगे,

प्रीती ने कहा ” मगर क्यूँ क्या वजह है,

राक्षश बोला ” क्यूंकि हम तुम्हारे बिना एक दिन भी नहीं रह सकते,

प्रीती ने कहा ” जिस तरह आप मेरे बिना नहीं रह सकते बिलकुल उसी तरह में भी अपने माता-पिता के बिना नहीं रह सकती .

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राक्षस प्रीती की बात सुन सोच में पड गया फिर थोड़ी देर बाद बोला अगर तुम अपने माता पिता से मिलना चाहती हो तो मेरी एक शर्त है,

प्रीती ने पूंछा ” कैसी शर्त ?

राक्षस ने कहा ” तुम्हे ठीक 8 दिन बाद अपने माता पिटा से मिलकर वापस आना होगा, प्रीती बोली ठीक है मुझे मंजूर है में ठीक आठ दिन बाद लौट आउंगी.

राक्षस बोला ” तो फिर ठीक है तुम अपने माता -पिता से मिल आओ राक्षस ने जाने की अनुमति दे दी, राक्षश से आज्ञा पाकर वह बहुत खुश हो गयी.

फिर वह उस जादुई कुर्सी पर बैठकर अपने माता-पिता के पास पहुँच गयी, प्रीती को देखकर उसके माता-पिता फुले नहीं समाये दोनों ने अपनी बेटी को साइन से लगा लिया.

प्रीती अपने माता-पिता से मिलकर राक्षस को जैसे भूल ही गयी थी, वह आठ दिन के बदले दस दिन तक वहां रही, दसवें दिन उसे राक्षस का ख्याल आया, प्रीती के बिना राक्षस की बुरी हालत हो गयी थी.

उसे प्रीती के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था, उससे दो दिन की भी जुदाई राक्षश को बर्दास्त नहीं हो रही थी, वह प्रीती के बिना बेहोश हो गया.

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उसे अपनी जरा भी सुधबुध ना रही प्रीती जब राक्षश के महल में लौटी तो वह बेहोश पड़ा था, उसे इस हालत में देखकर प्रीती रोने लगी, तभी वहाँ रखी गुड़ियों में से एक गुडिया बोली ” प्रीती तेरे आंसू इस राक्षस पर गिरेंगे तो बहुत बड़ा चमत्कार होगा.

वह राक्षश के पास जाके रोने लगी उसके आंसू राक्षस के उपर गिर रहे थे, जैसे ही उसके आंसू राक्षस के शरीर पर गिरे वैसे ही वह राक्षस एक राजकुमार में बदल गया.

प्रीती के आंसू गिरने से उसके श्राप का अंत हो चूका था ,और वो बुरी शक्ल वाला राक्षस एक सुन्दर राजकुमार में बदल चूका था, फिर राजकुमार और प्रीती जहाज में सवार होकर प्रीती के घर पहुंचे.

प्रीती को देखकर उसके माता पिता बहुत खुश हुए प्रीती ने अपने माता-पिता को सारी बात बताई, कुछ दिनों बाद ही प्रीती की शादी उसके माता पिता ने राजकुमार से कर दी और दोनों खुशी-ख़ुशी अपना जीवन व्यतीत करने लगे. Jadui Kahani

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10/9

Very nice story love it

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